Cattle health camp पशुओं को गलघोंटू एवं टैगिया रोग से बचाने के लिए शनिवार को अग्रसेन गौशाला, चढिश्मा, अंबिकापुर में पशुधन विकास विभाग द्वारा बहुउद्देशीय पशु चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान 305 पशुओं का परीक्षण और टीकाकरण किया गया।

अंबिकापुर। Cattle health camp पशुओं को गलघोंटू एवं टैगिया रोग से बचाने के लिए शनिवार को अग्रसेन गौशाला, चढिश्मा, अंबिकापुर में पशुधन विकास विभाग द्वारा बहुउद्देशीय पशु चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान 305 पशुओं का परीक्षण और टीकाकरण किया गया। साथ ही 208 पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाई गई और 19 पशुओं का उपचार भी किया गया। पशुओं को मौसमी बीमारी से बचाने के लिए राज्य स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है।

Cattle health camp जानिए क्या होता है गलघोंटू

पशु चिकित्सा शिविर का उद्घाटन करते हुए पशुधन विकास विभाग के उप संचालक डॉ. आर.पी. शुक्ला ने बताया कि, गला घोटू, जिसे रक्तस्रावी सेप्टिसीमिया भी कहा जाता है, मवेशियों और भैंसों में होने वाली एक गंभीर और अत्यधिक घातक जीवाणु जनित बीमारी है। Cattle health camp जिसका समय पर उपचार और टीकाकरण बहुत जरूरी होता है। शिविर में अतिरिक्त उप संचालक डॉ. सी.के. मिश्रा एवं गौशाला के अध्यक्ष हीरालाल गर्ग द्वारा गाय और बधिया को माला पहनाकर एवं गुड़ खिलाकर किया गया।

तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया

इस अवसर पर डॉ. सुनील मिंज द्वारा गौशाला के पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया और पशुपालकों एवं गौशाला प्रबंधकों को पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और प्रबंधन के विषय में तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया। शिविर में गौशाला के उपाध्यक्ष जय भगवान अग्रवाल, राम निवास असवाल, पशु चिकित्सा सहायक अल्पज्ञ डॉ. सुनील मिंज, सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी ब्रजेंद्र सिंह एवं उमेश कुशवाहा सहित कई अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

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गला घोटू के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं

  • तेज बुखार: अचानक तेज बुखार आना (104°–106°F या 40°–41.1°C)।
  • सुस्ती और उदासी: पशु सुस्त हो जाता है और हिलने-डुलने में अनिच्छा दिखाता है।
  • नाक और मुंह से स्राव: अत्यधिक लार बहना और नाक से पानी जैसा स्राव आना, जो बाद में गाढ़ा और पीला हो सकता है।
  • गले में सूजन: गले के क्षेत्र में दर्दनाक सूजन, जो गर्दन और छाती तक फैल सकती है। सांस लेने में कठिनाई के कारण पशु हांफता है और घरघराहट की आवाज निकालता है।
  • जीभ और श्लेष्मा झिल्लियों का नीला पड़ना (सायनोसिस): ऑक्सीजन की कमी के कारण जीभ और आंखों के आसपास की श्लेष्मा झिल्लियां नीली पड़ सकती हैं।
  • तेजी से मृत्यु: बीमारी बहुत तेजी से बढ़ती है और लक्षण दिखने के कुछ घंटों से लेकर 1-2 दिनों के भीतर पशु की मृत्यु हो सकती है। कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के अचानक मौत भी हो सकती है।
  • दूध उत्पादन में कमी: दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन अचानक कम हो जाता है।
  • कुछ मामलों में: दस्त और पेट दर्द भी हो सकता है।

रोकथाम के उपाय

  • टीकाकरण: स्थानिक क्षेत्रों में मानसून की शुरुआत से पहले 6 महीने और उससे अधिक उम्र के सभी स्वस्थ पशुओं का वार्षिक टीकाकरण सबसे प्रभावी रोकथाम उपाय है। तेल-सहायक टीके (oil-adjuvant vaccines) आमतौर पर 9-12 महीने तक सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • स्वच्छता: बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए और चारा, पानी आदि को दूषित होने से बचाना चाहिए।
  • भीड़भाड़ से बचें: खासकर गीले मौसम में पशुओं को अधिक संख्या में एक जगह पर रखने से बचें।
  • तनाव कम करें: पशुओं को तनाव मुक्त रखने का प्रयास करें, क्योंकि तनाव रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर सकता है।

उपचार क्या है…

  • यदि बीमारी के शुरुआती चरणों में, यानी बुखार आने पर तुरंत उपचार शुरू किया जाए तो कुछ पशुओं को बचाया जा सकता है।
  • पशु चिकित्सक द्वारा ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स (जैसे ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, एनरोफ्लोक्सासिन) या सल्फोनामाइड्स का अंतःशिरा इंजेक्शन दिया जा सकता है।
  • सूजन और दर्द को कम करने के लिए सहायक दवाएं भी दी जा सकती हैं।
  • हालांकि, एक बार जब नैदानिक लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं, तो उपचार अक्सर अप्रभावी होता है और मृत्यु दर बहुत अधिक होती है।
  • गला घोटू पशुधन के लिए एक गंभीर खतरा है, और इसकी रोकथाम के लिए टीकाकरण और उचित प्रबंधन practices महत्वपूर्ण हैं। यदि आपके पशुओं में गला घोटू के लक्षण दिखाई देते हैं, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।